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मोटिवेशनल कविता

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जिंदगी का हौसला बुलंद करने के लिए आज कुछ पंक्तिया प्रस्तुत कर रहा हु। जीवन मे कभी ना कभी असफलताओ का सामना करना पड़े तो ये पंक्तियां जरूर पढ़ना।  शीर्षक है   "उठ खड़ा हो सूरज कभी उगना     नही छोड़ता है"  1.हताश है तू, निराश है तू, खो चुका मन की आस है तू। माना तुझे तेरे मन का मिला नही, अब तुझमे पहले जैसा हौसला नही। बुढ़ा बाप भी कभी अपनी जिम्मेदारियों से मुँह नही मोड़ता है। उठ, खड़ा हो सूरज कभी उगना नही छोड़ता है। 2. माना हादसों से टूट गया है तू, अपने ही अंदर बट गया है तू। घनघोर अंधेरा है तो क्या हुआ, दूर अभी सबेरा है तो क्या हुआ। चाहे अमावस की रात हो, सबेरा कभी आना नही छोड़ता है। उठ, खड़ा हो सूरज कभी उगना नही छोड़ता है। 3. याद कर कभी चन्द्रमा का चांद था तू, अपने वक़्त का बेताज सरताज था तू। अब तू क्यों इतना मायूस होता है, अरे मासूम बच्चा भी गिरकर ही चलना सीखता है। स्वर्ण तभी निखरता है, जब वो तपता है। उठ, खड़ा हो सूरज कभी उगना नही छोड़ता है। 4.अब नही कर पाऊंगा, मुझसे होता नही। बिना संघर्ष के तो तितली का भी जन्म होता नही। मन से हारा है, सच...

" मेरे सपनों का भारत कुछ ऐसा हो'

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एक अतुलनीय भारत के बारे मे मैने सोचा जिन्हें पंक्तियों में उतारा है ,पसन्द आये तो प्रतिक्रिया जरूर दे                              शीर्षक है            "काश मेरे सपनों का भारत कुछ ऐसा हो" 1.जहा ना नफरतो का रंग हो, आपसी प्रेम और दिल मे कुछ करने की उमंग हो। जहा भी जाये सब संग-संग हो, सब पर मोहब्बतों के रंग हो। जहा सबकुछ पैसा ना हो, मेरे सपनों का भारत कुछ ऐसा हो। 2.ना किसी को जाति के नाम पर दुत्कारा जाता हो, और ना ही कोई बच्चा गरीबी के कारण पढ़ाई से वंचित रह जाता हो। जहा ना दहेज की लालसा में बेटिया जलायी जाती हो, और जहा ना ही बेटे की लालच मे गर्भ में ही बेटिया मिटायी जाती हो। जैसा मैंने लिखा बस वैसा का वैसा हो, मेरे सपनों का भारत कुछ ऐसा हो। 3. जहा बच्चे बड़े होने पर भी अपनी माँ के साथ रहते हो, बड़ो के सामने एक लब्ज तक ना बोलते हो। जहा बहु में बेटी नजर आती हो, और बहू को भी सासु माँ की खटपट बहुत भाती हो। जहा पिताजी को आज भी "बाबुजी" का दर्जा हो, मेरे सपनो का भारत कुछ ऐसा हो।...

"झूठी खुशियो में दम तोड़ते रिश्ते"

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मेरी पहली कहानी, जिसका शीर्षक है "झूठी खुशिया, दम तोड़ते रिश्ते" अरुणिमा- अपने पति अरुण से अजी सुनते हो, जल्दी उठो ना । कहकर काम करने चली गयी। अरुण भी उठकर अपनी पत्नी अरुणिमा को गले लगाते  हुए कहते है इस जीवन की भागदौड़ में ना जाने कब 38 वर्ष पूर्ण हो गए , हम दोनों को लड़ते झगड़ते। अरुणिमा- वोही तो कह रही हु बेटा बहु आने वाले है उनका मनपसन्द खाना जो बनाना है। बहुत काम है और ऊपर से आप नही उठ रहे थे। इतना कहकर अरुणिमा काम मे लग जाती है। अरुण भी अपने 38 वर्ष के चिंतन में डूब जाते है, कैसे लड़ते झगड़ते, बच्चों की परवरिश फिर उनकी पढ़ाई  , लिखाई शादी आदि जिम्मेदारियां निभाते-निभाते जीवन के 38 वर्ष पूर्ण हो जाते है। इतने में अरुणिमा गरमागरम चाय लाकर देती है और कहती है कहा खो गए जनाब, अरुण कुछ नही बस युही। इतने में मोबाइल फ़ोन की घंटी सुनाई देती है, अरुणिमा तेज चहल कदमी करते हुए , फ़ोन उठाती है, उधर से आवाज आती है माँ शादी की सालगिरह की शुभकामनाएं धन्यवाद बेटा,अरुणिमा की खुशी का ठिकाना नही रहता आखिरकार फ़ोन भी 2 महीने बाद आया था; बेटे का, ले बाबुजी से बात कर ले ऐसा कहकर अरुणिमा फ़...

मैने हार कब मानी है

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     ऊर्जा का संचार करने के लिए कुछ पंक्तिया प्रस्तुत कर रहा हु शीर्षक है-                     "मैने हार कब मानी है" 1.माना घना अंधेरा है , दूर अभी सबेरा है। पग पग चलना है, इन दुखो से लड़ना है। यही तो जीवन की रवानी है, लेकिन मैंने हार कब मानी है। 2.समस्याओ ने घेरा है , डाला मुझ पर डेरा है। अंधेरो से तो मेरा पुराना नाता है, इन्हें मेरा घर कुछ ज्यादा ही भाता है। दुख सुख तो इस जीवन की कहानी है, लेकिन मैंने हार कब मानी है। 3. अपनो के ही चक्रव्यूह में घिर गया हूं, ये ना सोचो कि डर गया हूं। निकलना मुझे भी आता है, संघर्षो से तो मेरा पुराना नाता है। मेरे अंदर दौड़ रहा खून खानदानी है, मैने हार कब मानी है। 4.मुझसे ना कभी हो पायेगा ऐसा कभी मैने सोचा नही। लाख मुश्किलें आयी लेकिन मैं कभी हारा नही। आंधी तूफानो ने कब बरगद की जड़े उखाड़ी है। आज उनकी तो कल अपनी भी बारी है। अरे इन सबसे तो मेरी दोस्ती बहुत पुरानी है, मैने हार कब मानी है। 5. जब कभी भी हालातो के सामने टिक ना पाओ। जब कभी भी परिस्थितियों...

चुनाव आ गए

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चुनाव पर मेरी व्यंग भरी रचना जरूर पढे, रचना का शीर्षक है                   "लगता है चुनाव आ गए" 1. जो कल तक हमे देखते नही थे, आज हमे देखकर मंद -मंद मुस्कुरा गए,आजकल हमारे भी बाजार में कुछ भाव आ गए , लगता है चुनाव आ गए। 2.जो अपने ही किये वादों से भागे फिरते थे, आज नयी  घोषणाओं के साथ फिर वही जनाब  आ गए। जो कल तक मंहगी गाड़ियों में फिरते थे, आज उनके भी पाँव आ गए , लगता है चुनाव आ गए। 3.जिनके चक्कर मे कल तक हम दफ्तर दफ्तर फिरते थे , आज हमारी घर की चौखट पर वो भी दबे पाँव आ गए औऱ कभी कभार ही अमा गरीब की थाली में भी पुलाव आ गए,लगता है चुनाव आ गए। 4.माँ दादी , भैया -भाभी ना जाने कितने रिश्तों से जोड़ा उन्होंने, जो हमे कल तक पहचानते नही थे, आज उनको हमारे साथ सारे रिश्ते याद आ गए, लगता है चुनाव आ गए। 5.कल तक हम भाई-भाई हुआ करते थे, आज वो हमको आपस मे ही लड़ा गए। मंदिर -मस्जिदों के मुद्दे उन्हें अचानक ही याद आ गए, लगता है चुनाव आ गए । 6.माना कि ये कल हमारे पास नही आएंगे, लेकिन हम भी अपना फर्ज जरूर निभाएंगे। मतदान करके हम अप...

अटल जी को नमन

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    अटल बिहारी वाजपेयी जी पर कुछ पंक्तिया लिखने की           कोशिश की कविता का शीर्षक है       "हर हिदुस्तानी के जेहन में तुम्हारा नाम अटल था, अटल          है और अटल रहेगा" 1.उनके जैसा ना था , ना है और ना रहेगा, इस दुनिया मे तुम्हारा नाम हमेशा रहेगा, इस देह रूप में तुम हमारे साथ  ना हुए तो क्या हुआ, तुम्हारे विचारो का शमा हमेशा बना रहेगा, हर हिदुस्तानी के जेहन में तुम्हारा नाम अटल था अटल है और अटल रहेगा। 2. गॉवो से भारत जोड़ो का नारा दिया तुमने, भारत को विकास की गतिशीलता पर लाकर खड़ा किया तुमने। तुम्हारी एक एक कविताओं से युवाओं में जन्मो जन्मो तक अदम्य साहस भरा रहेगा, हर हिदुस्तानी के जेहन में तुम्हारा नाम अटल था, अटल है और अटल रहेगा........... 3.जब उस कायर पाकिस्तान ने धमकी दी परमाणु हमले की, तुम्हारे दो टूक जवाब से ही उसने दोबारा ना हिम्मत की बोलने की। अगर हुआ परमाणु हमला तो माना आधा हिदुस्तान गवा दिया हमने, लेकिन कल सुबह इस धरती पर पाकिस्तान का नामोनिशान नही रहेगा। हर हिदुस्तानी के जेहन में...

"हे भारत माँ"

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                   एक सैनिक की भारत माँ से बात                        कविता का शीर्षक है "माँ ये  तेरा स्वभिमान ना मिटने देगे हम, इस पावन मिट्टी का मान ना घटने देगे हम।" 1. माँ तेरे बच्चे इस धरा पर खड़े है सीना तान के, हे किसमे हिम्मत जो आँख उठा लेगा भारत के सम्मान पे। बात अगर आयी लहू बहाने की तो लहू की नदियां तक बहा देगे हम, माँ ये स्वाभिमान ना मिटने देगे हम.......... 2. एक शीश के बदले अनेको शीश लाने का प्रण लेते है, माँ तेरे सैनिक बेटे खून का कतरा-कतरा न्योछावर कर देते है। घर की माँ का बेटा  ना आये तो गम नही, पत्नी का श्रृंगार न्योछावर हो जाये तो गम नही। भारत माँ तेरे श्रृंगार में कुछ ना कमी होने देंगे, माँ ये स्वाभिमान ना मिटने देगे हम............. 3.माँ तेरे टुकड़े करने का इन गद्दारो में दम नही, ये बुजदिल गरजने वाले बादल है इनके बरसने का कोई मौसम नही। भारत भूमि पर देखने की कोशिस की तो ये कभी ना देख पायेगे, अरे  जलती हुई राडो से इनकी आंखों की रोशनी...

"अब सुकून कहा"

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                          पंक्तियों का शीर्षक है                              "अब सुकूँ कहा" 1.सुबह से ही भागदौड़ करता हु मैं, बिना शाम के ही रातो को जी रहा हु मै, दुनिया तो बस इधर से उधर दौड़े जा रही है कभी यहा कभी वहा, अब सुकूँ कहा........ 2.माँ की गोद मे सिर रख कर ना जाने कब सोया था मै, ना जाने कब पिताजी को याद करके रोया था मै, अब तो बॉस की ही बातों में मिलाते जा रहा है हा में हा, अब सुकून कहा......... 3.दुनिया भी बहुत कुछ बटोर रही है कुछ ना ले जाने के लिए, मै भी उसका हिस्सा हु ना जाने किसलिए, अपनो से बात किये बिना बित गया एक अरसा , अब सुकून कहा......... 4. चौपालों पर बैठकर दोस्तो के साथ बाते करता था मैं, उन पलों को खुशियो से जीता था मै, उन चौपालों की शामो में बस जाता था पूरा जहाँ, अब सुकूँ कहा....... 5.पहले साधनों के अभाव में भी खुशी से जीते थे हम, बिन बिजली पंखे के भी सुकून से सोते थे हम,  अब तो मखमल के गद्दों पर भी वैसी नींद क...

"ना जाने क्या-क्या हो रहा है!"

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                             "ना जाने क्या क्या हो रहा है!" 1. गॉवो की संस्कृति जा रही है, शहर वाली गॉवो में बहुये बनकर आ रही है, गॉवो के बेटों को फिर शहर ले जा रही है, ये देखकर अकेला बूढ़ा बाप रो रहा है, ना जाने क्या- क्या हो रहा है...... 2. आज का इंसान मुह पर मीठा और अपने अंदर जहर घोल रहा है, चौपालों को मोबाइलों ने छीन लिया है, पास बैठा आदमी-आदमी से नही बोल रहा है, ना जाने क्या क्या हो रहा है........ 3.कोई मेहबूब की यादो में रो रहा है तो कोई मेहबूब के मिलने पर सर पिट रहा है,आजकल फूल पर फूल मेहबूब को बाटे जा रहे है, और अपने माँ बाप के प्यार को भूल रहा है, ना जाने क्या- क्या हो रहा है...... 4.पूंजीपति पेट कम करने के लिए दौड़ रहा है, गरीब पेट भरने के लिए  दौड़ रहा है, जो ये कहकर आये थे गरीबी हटाएंगे वो सत्ता में आते ही गरीबो को महंगाई के तराजू में तोल रहा है, ना जाने क्या- क्या हो रहा है...... ✍🏼मयंक शुक्ला✍🏼 8770988241, 9713044668

"कोई मेरे बचपन के पल लौटा दो"

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                   "कोई मेरे बचपन के पल लौटा दो" 1. वो मेरी बचपन की दोस्ती प्यारी, जिसमे ना होती थी गद्दारी। पल-पल झगड़ लेते थे हम, लेकिन अगले ही पल में एक साथ होते थे हम। एक बार ही सही फिर से मौका दो, कोई मेरे बचपन के पल लौटा दो........ 2. वो दोस्तो के साथ घर -घर घूमने जाना, सुबह से शाम तक घर ना लौट के आना। लड़ाई होने पर घर रोते हुए आना,अब ना खेलूंगा इनके साथ ये बात माँ को बताना। मेरे बचपन वाली लड़ाई ही करवा दो, कोई मेरे बचपन के पल लौटा दो....... 3.वो दोस्तो के साथ नदी पर नहाना, वही से क्रिकेट खेलने जाना। पापा के लौटने के पहले घर आना , और बेफिक्र हो जाना। यारो मुझे वो यादो की नदी में डूबा दो, कोई मेरे बचपन के पल लौटा दो......... 4.शाम को मिलते ही दिनभर की बाते करना, चौपालों पर बैठकर एक दूसरे पर आरोप मढ़ना। आज इससे लड़ाई, कल उससे झगड़ा फिर अगले ही पल साथ हो जाना। बचपन की मासूमियत को लौटा दो, कोई मेरे बचपन के पल लौटा दो...... 5.आज के दौर में परिवर्तन तो हुआ है, उन चौपालों की बैठको को मोबाइल ने छिन लिया है। अब साथ रहकर भी आपस...

"याद आती है माँ"

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जब बिन खाये सुबह से शाम हो जाती है तो याद आती है माँ। जब एग्जाम देते जाते समय दही को कटोरी ना सामने आती है तो याद आती है माँ। जब अपनो के द्वारा ही ठोकर खाता हूं तो याद आती है माँ। जब दुनिया की चालाकियों को नही समझ पाता हूं तो याद आती है माँ। कई दफा जब बिन खाये ही थककर सो जाता हूं तो याद आती है माँ। जब कड़ी धूप में किसी का आचंल नही पाता हूं तो याद आती है माँ। ✍🏼मयंक शुक्ला 8770988241, 09713044668

"माँ"

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माँ से दूर होते तो माँ का एहसास कैसे होता है, उस पर कुछ पंक्तिया।              शीर्षक है- "माँ" 1. जब ये शरीर थक हारकर घर जाता है, माँ तेरा प्यार बहुत याद आता है। पल-पल खोजता हु तुझे इन आँखों से,पर ना जाने  क्यों तुझे ढूंढ नही पाता है। माँ तेरा प्यार बहुत याद आता है।  2. लेकिन माँ तो माँ होती है,बच्चे का दुःख उस्से देखा नहीं जाता है। एक हवा का झोंका तेरा एहसास करा जाता है, माँ तेरा प्यार बहुत याद आता है।  3. जब ये मन खुद को अकेला पाता है, इस छल रूपी दुनिया में रहा नहीं जाता है। लेकिन तेरी दुआओ का असर रह जाता है,माँ तेरा प्यार बहुत याद आता है। 4. इस दुनिया के प्रपंचो में खुद को उलझा हुआ पाता है, तो तेरे ममता के आसरे में ये मन खुद चला जाता है। माँ तेरी यादो का झरोखा ,इस नन्हे बेटे को रुला ही देता है, माँ तेरा प्यार बहुत याद आता है। माँ तेरा प्यार बहुत याद आता है। ✍मयंक शुक्ला✍8770988241,9713044668

"वो पिता होता है"

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                पिता पर लिखी गयीं कुछ पंक्तिया                                " वो पिता होता है" 1.वो बूढ़ा होकर भी जवानों जैसी मेहनत करता है,  जो बच्चो द्वारा की गई फरमाइश को चंद लम्हो मे ही पूरा करता है, जो बीमार होते हुए भी बीमार ना लगता है, वो पिता ही होता है। 2.कभी मोची बनकर , कभी कंडक्टर बनकर अनगिनत रूपो में वो दिखता है, पिता वो पेड़ होता है जिसके साये में छाव का सुखद एहसास होता है, जो बूढ़ा होकर भी बूढ़ा नही होता है, वो पिता होता है। 3.जो बेटी की शादी में हर किसी के हाथ जोड़ता है,वो बेटी की खुशी के लिये अपनी जीवन भर की कमाई न्यौछावर करता है, मेरी लाडली बेटी खुश रहेगी ये सोचकर जीता है , वो पिता होता है। 4.जो बेटी की विदाई में एक आँसू आँख में ना लाता है, बेटी की खुशी के लिए एक-एक पैसा जुटाता है,दहेज की मांग पर जो बेचैन हो जाता है,बेटी को विदा करके जो मन ही मन रोता है ,वो पिता होता है। 5. जो आर्थिक तंगी में भी घर मे एहसास ना होने देता है, जो चंद प...

कुछ दर्द उन बच्चीयों के लिए

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बच्चीयों के लिए दिल से निकली कुछ पंक्तिया और मन व्याकुल है, हमे सोचना पड़ेगा कि हम कहा है।         "मुझे ना नोचो बाबा मै भी किसी की बच्ची हु" 1. नफरतो के रंग में मुझे ना ढालो, आपसी द्वेष आपस मे ना पालो, मै तो आज भी दिल से सच्ची हु, मुझे ना नोचो बाबा मै भी  किसी की बच्ची हु। 2.मुझे क्या पता कौन हिन्दू, मुस्लिम ,सिख ,ईसाई।, मैने तो पढ़ा था कि ये है आपस मे भाई -भाई, मै तो अभी भी उम्र और समझ मे कच्ची हु, मुझे ना नोचो बाबा मै भी किसी की बच्ची हु। 3.उन्होंने मुझे पास बुलाया बेटी बोलकर, मुझे क्या पता था वो मुझे रख देगा हैवानियत से तोलकर। मै तो भगवान के आगे भी कई दफा चीखी हु, मुझे ना नोचो बाबा मै भी किसी की बच्ची हु। 4. ना जाने कितनी हैवानियत का रंग चढ़ा था उनपर, कितनी दफा मुझे नोचा गया एक-एक कर, क्या पता उन दरिंदो को कितने दर्द में तड़पी हु , मुझे ना नोचो बाबा मै भी किसी की बच्ची हु। 5.मै भूखी थी, प्यासी थी, दर्द में कराह रही थी, लेकिन उन दरिंदो को तो मै बस हवस नजर आ रही थी, उन दरिंदो को ना छोड़ना दिल से आवाज निकाली हु, मुझे ना नोचो बाबा मै भी किसी की बच्ची हु...

"आप धीरे-धीरे मरने लगते हो"

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                    कुछ पंक्तिया शीर्षक है                "आप धीरे- धीरे मरने लगते हो" 1.जब आप किसी बच्चे के साथ बच्चा नही बन पाते हो,जब आप अपने मन की नही सुन पाते हो, जब आप अपने मन की सुनकर भी अनसुना सा कर देते हो तब आप धीरे -धीरे मरने लगते हो........................... 2.जब आप थक-हार के घर जाते हो,जब आप सुबह से शाम तक मुस्कुरा नही पाते हो,जब आप परेशानियों में उलझ से जाते हो तब आप धीरे- धीरे मरने लगते हो.............. 3. जब आप किसी परिस्थिति को जीत नही पाते हो,जब आप अपने मन से ही हार जाते हो,जब आप अपनी समस्या को खुद नही सुलझा पाते हो तब आप धीरे -धीरे मरने लगते हो ......... 4.जब आप सब कुछ छोड़कर पैसो के पीछे भागते हो,जब आप सबकुछ पाकर भी बहुत कुछ खो देते हो, जब आप छोटे-छोटे पलो का मजा नही ले पाते हो तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हो......... 5. जब आप किसी जरूरतमंद की मदद नही कर पाते हो,जब आप किसी के दुख का हिस्सा नही बन पाते हो, जब आप भीड़ में भी अकेला महसूस करते हो तब आप धीरे-धीरे मरने लगते ...

"जातिगत आरक्षण"

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              सामान्य वर्ग की व्यथा पर कुछ पंक्तिया मै भी सामान्य वर्ग का दलित हु साहब मुझे भी आरक्षण चाहिए.. 1.मेरी माँ का सपना है बेटा सरकारी अफसर बने,पिता दिन-रात मेहनत करके उस सपने को बुने, मेरे मात-पिता के सपनो को यू ना जलाइये, मै भी सामान्य वर्ग का दलित हु साहब मुझे भी आरक्षण चाहिए.......... 2.पिता ने कर्ज लेकर पढ़ाया मुझको, इस आस में की बेटा एक दिन सुत समेत चुका देगा इसको, एक पिता की मेहनत को इस कदर ना बहाइये , मै भी सामान्य वर्ग का दलित हु साहब मुझे भी आरक्षण चाहिए............ 3.बहन की आस हु मै, पिता का विश्वास हु मै, मेरे माँ के सपनो का साकार रूप हु मै, इतनो की आस को यू ना डुबाइये, मै भी सामान्य वर्ग का दलित हु साहब मुझे भी आरक्षण चाहिए........... 4.जब बेटा डिग्री लेकर घर को जाता है, मात-पिता सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है,रोजगार की तलाश में अब यू ना भटकइये, मै भी सामान्य वर्ग का दलित हु साहब मुझे भी आरक्षण चाहिये... 5.जब कभी भी घर जाता हूं मैं, मात-पिता के सपनो को उनकी आंखों में देखकर कई दफा मर जाता हूं मैं,अब मुझे अपनी नजरो में ही ...

"नारी शक्ति"

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       "विश्व महिला दिवस " कुछ पंक्तिया शीर्षक है                   "हा एक नारी हु  मै" 1. हा एक नारी हु मै, औरो के सपनो पर जीती हु, घर के किसी कोने में रोती हु; बिलखती हु, लोगो की नजरों में बेचारी हु मै, हा एक नारी हु मै......... 2.अपमानों का घुट पीकर रह जाती हूं मैं, कभी दहेज के लिए , कभी सिरफिरे आशिक के लिए जला दी जाती हूं मैं, सम्मान की आस में अपना पूरा जीवन गुजारी हु मै, हा एक नारी हु मै......... 3.कभी कभी तो मुझे माँ की कोख मे ही मार दिया जाता हैं, मेरी नन्ही सी दुनिया को चंद महीनों में ही उजाड़ दिया जाता है, मत मारो माँ ये आवाज माँ की कोख मे से पुकारी हु मै, हा एक नारी हु मै..... 4.लोगो की मैली नजर को दिनभर ढोती हु मै, कभी कभी अपनो का ही शिकार होती हु मै, अपनो पर ही भरोसा नही कर पा रही हु मै , हा एक नारी हु मै........ 5.कभी दुर्गा ,लक्ष्मी , सरस्वती के रूप में पूजी जाती हु मै, कभी लोगो की हवस के लिए नोची जाती हु मै,अपनो के सम्मान में जिंदगी जीती जारही हु मै, हा एक नारी हु मै......... 6.काश मुझे भी सम...
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      होली के पावन पर्व पर कुछ पंक्तिया शीर्षक है              "कि आ सखी होली खेले" 1.कि आ सखी होली खेले,  कुछ रंग प्यार के, कुछ रंग दुलार के ,कुछ रंग एक दूसरे के साथ के एक दूसरे पे उड़ेले  कि आ सखी होली खेले। 2.नफरतो के रंग को, दुनिया के प्रपंचो को , अपने अंदर की बुराइयों को चल यही छोड़ चले , की आ सखी होली खेले.......... 3.हँसी, खुशी ,मुस्कुराहट के रंगों को एक दूसरे के संग में घोले, की आ सखी होली खेले.. ..... 4.इस अकेलेपन को, जीवन के नीरस रंग को ,इंद्रधनुष जैसे सतरंगी रंगों में रंगेले, की आ सखी होली खेले................... 5.संसार के झमेलों से , दुनिया के मेलो से चल कही दूर चले ,कि आ सखी होली खेले............ 6.नफरतो के रंग को,गलतफहमियों से पैदा हुए कड़वे संबंध को प्यार के रंगों में घोले ,कि आ सखी होली खेले........ 7.इछारूपी रंग ना कभी पूरा होने वाला है, इसलिए जहा है वही का मजा ले , इतने सारे रंगों को अपने जीवन मे उड़ेले कि आ सखी होली खेले............✍🏻 मयंक शुक्ला✍🏻

"रावण"

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रावण नाम सुनते ही हमारे मानसपटल दानव,दैत्य, राक्षस की छवि आ जाती है। लेकिन रावण क्या वाकई में वैसा इंसान था जैसा हम सोचते है,क्या वाकई में हम रावण का पुतला जलाने लायक है। रावण एक ऐसा किरदार जिसे बुराई का प्रतिक माना जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए जलाया जाता है,लेकिन क्या रावण वाकई में इतने बुरे इंसान थे जितना आज का इंसान हुआ जा रहा है। रावण जी को प्रखण्ड पंडित कहा जाता था, हा उन्होंने सीता माता का अपरहण किया था लेकिन उन्होंने कभी माता सीता को जबरजस्ती छूने की कोशिस भी नहीं की, लेकिन आज का इंसान तो ना जाने क्या क्या कर रहा है? रावण जी ने तो अपने दशोशिश निकाल कर अपना किरदार बताया लेकिन आज के इंसान में न जाने कितने रावण(बुराई) छिपी हुई है। रावण जैसा भाई तो हर बहन को मिले जिसने अपनी बहन के लिए पूरे कुल और स्वयं को भी नष्ट कर लिया। अब में आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहता हु और उम्मीद करता हु आप सब अपने अंतर्मन से सोचेंगे, अगर रावण गलत है तो हर वो इंसान गलत है, जो किसी परायी स्त्री पर नजर रखता है,जो अपने भाई का अपमान करता है,जो अपने अहंकार में जीता है,जिसमे कोई ना कोई बुराई जरूर है क्य...

"हा मेरे देश में ही तो होता है"

1.कोई करोडो लेकर विदेश चला जाता है, गरीब किसान कर्ज में रोज फाँसी लगाता है।। हा मेरे देश में ही तो होता है...... 2. दहेज़ के नाम पर बेटियो को जलाया जाता है, देश की बेटियों का गर्भ में ही गला दबाया जाता है। हा मेरे देश में ही तो होता हैं......... 3.55 नंबर वाला अफसर बन जाता है, 80 नंबर वाला रोजगार तलाश में दर दर भटकता है। हा मेरे देश में ही तो होता है........ 4.गरीबो का नेता घोटाले पर घोटाले करता जाता है, फिर भी मेरे देश का आम इन्सान अच्छे दिन की आस लगाता है। हा मेरे देश में ही तो होता है......... 5.ना जाने कब कोई आदमी आम से खास बन जाता है, जिनका विरोध करके सत्ता में आया था उनसे ही हाथ मिलाता हैं। हा मेरे देश में ही तो होता है....... 6. वंशवाद की राजनीती को बढ़ा चढ़ाकर बताया जाता है, हमारे देश में विकास का पैमाना भी जाति के आधार पर नापा जाता है। हा मेरे देश में ही तो होता है....... 7.देश के खिलाफ बोलने वालों को अभिव्यक्ति की आजादी बताया जाता है, एक आतंकवादी के लिए आधी रात तक कोर्ट चलाया जाता है। हा मेरे देश में ही तो होता है....... 8.फिर भी मेरा देश मुझे सबसे प्यारा लगता है,...